सफलता की कहानी

सौमिक दत्ता का शो ‘मेलोडीज़ इन स्लो मोशन’ दर्शकों को प्रकृति की आवाज़ सुनने और सांस लेने की याद दिलाता है

चेन्नई में हाल ही में प्रदर्शित होने वाला सांगीतिक प्रोग्राम “मेलोडीज़ इन स्लो मोशन” सौमिक दत्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसने प्रकृति की सूक्ष्म ध्वनियों और उनके महत्व को उजागर किया है। यह शो न केवल प्राकृतिक आवाज़ों की खूबसूरती को सामने लाता है, बल्कि पर्यावरण परिवर्तन की गंभीरता को भी समझाता है।

किसी ने कभी सोचा है कि सिकलिडा नामक कीट वास्तव में गाता है या नहीं? या जब एक केकड़ा चलता है तो वह किस प्रकार की आवाज उत्पन्न करता है? “मेलोडीज़ इन स्लो मोशन” ऐसे सवालों के जवाब खोजता है और दर्शकों को प्रकृति की उन आवाज़ों से परिचित कराता है जिन्हें अक्सर हम अनसुना कर देते हैं।

प्रस्तुति के दौरान, सौमिक दत्ता ने मोतीसर और कर्कश आवाज़ों जैसे कि पत्तियों के चरमराने, टहनियों की खड़कने और कीटों की धीमी-धीमी गुनगुनाहट को संगीत के रूप में प्रस्तुत किया। यह कार्य न केवल कला की दृष्टि से अभिनव है, बल्कि यह पर्यावरणीय जागरूकता भी बढ़ाता है।

इस शो में प्रकृति की सूक्ष्म आवाज़ें जैसे झिंझमाते कीड़ों की सिसकियाँ और हवा में घुसते पत्तों की खरोखराहट को विशेष ध्वनि तकनीकों के माध्यम से उभारा गया, जिससे दर्शकों को यथार्थ अनुभव हुआ कि वे वास्तव में प्रकृति के बीच हैं।

सौमिक दत्ता ने कहा, “हम अक्सर प्रकृति की छोटी-छोटी आवाज़ों को नहीं सुन पाते, पर वे हमें जलवायु परिवर्तन की कहानी सुनाती हैं। ये ध्वनियाँ बदल रही हैं, और उनकी गूँज हमारे पर्यावरण के बिगड़ते हालात का संकेत देती है।”

चेन्नई के इस कार्यक्रम ने वन्यजीवों और प्राकृतिक तंत्रों में हो रहे बदलावों को सुनने की एक नई दृष्टि प्रदान की है, जिससे लोगों का पर्यावरण के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता बढ़ी है। दर्शकों ने इस प्रस्तुति को न केवल संगीत की एक अनोखी अभिव्यक्ति माना, बल्कि इसके पीछे छिपी गंभीर समस्या को समझने का मौका भी पाया।

“मेलोडीज़ इन स्लो मोशन” ने यह दिखाया कि पर्यावरणध्वनि केवल पृष्ठभूमि की आवाज़ें नहीं हैं, बल्कि वे हमारा संदेशवाहक भी हैं। यह अनुभव प्रकृति के साथ पुनः जुड़ने और उसकी रक्षा के लिए प्रेरित करने वाला साबित हुआ।

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