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हैदराबाद में कर्रा समू: तेलंगाना की पारंपरिक लकड़ी लड़ाई कला की वापसी

हैदराबाद: एक समय युद्ध कौशल और लोक परंपरा रही कर्रा समू आज हैदराबाद में फिर से जीवन पा रही है। यह पारंपरिक लकड़ी से लड़ने की कला अब न केवल आत्मरक्षा का माध्यम बन रही है, बल्कि बच्चों और वयस्कों के बीच एक लोकप्रिय फिटनेस अभ्यास के रूप में भी उभर रही है।

कर्रा समू तेलंगाना के ग्रामीण इलाकों से आती है, जहाँ इसे एक महत्वपूर्ण लड़ाई की तकनीक माना जाता था। इसका मुख्य उपयोग समरभूमि में घातक हथियार के तौर पर होता था, जिसमें लकड़ी की छड़ों का प्रयोग कर विरोधी को हराया जाता था। समय के साथ यह परंपरा कमजोर पड़ने लगी और कई जगह इसे भुला दिया गया। लेकिन अब स्थानीय समुदायों और संगठनों की पहल से इसे दोबारा प्रोत्साहन मिल रहा है।

हैदराबाद के कई सांस्कृतिक केंद्रों में कर्रा समू की कक्षाएं लगाई जाने लगी हैं, जिसमें बच्चे और बड़े दोनों भाग ले रहे हैं। प्रशिक्षकों का मानना है कि यह कला न केवल शारीरिक मजबूती बढ़ाती है, बल्कि मानसिक अनुशासन और आत्मविश्वास भी प्रदान करती है। साथ ही, यह युवाओं को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का भी काम करती है।

इसके अलावा, कर्रा समू को आत्मरक्षा के तौर पर भी देखा जा रहा है। प्रशिक्षक बताते हैं कि इस कला की तकनीकें आज के शहरी जीवन के लिए उपयुक्त हैं और शार्प मूवमेंट की वजह से यह व्यक्तिगत सुरक्षा में मददगार साबित होती हैं।

स्थानीय कलाकार और सामाजिक संगठन कर्रा समू के आयोजन और प्रतियोगिताओं के माध्यम से इस परंपरा को लोकप्रिय बनाने में जुटे हैं। इसके चलते युवा वर्ग में इस कला के प्रति रुचि बढ़ी है और नई पीढ़ी इसे सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित हो रही है।

कर्रा समू की इस पुनरुत्थान यात्रा से तेलंगाना की सांस्कृतिक पहचान मजबूत हो रही है और यह पारंपरिक कला नई ऊर्जा के साथ जीवंत हो रही है। ऐसा लगता है कि भविष्य में कर्रा समू न केवल एक विरासत की तरह बल्कि आधुनिक फिटनेस और आत्मरक्षा प्रणाली के रूप में भी अपनी जगह बनाएगी।

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