अंतर्राष्ट्रीय

ट्रम्प प्रशासन ने पुराने टैरिफ्स को न्यायोचित ठहराने के लिए नई बहाना चुना

वाशिंगटन, 27 अप्रैल। ट्रम्प प्रशासन ने पिछले वर्षों में लगाए गए पुराने टैरिफ्स को सही ठहराने के लिए एक नया दृष्टिकोण अपनाया है। प्रशासन ने अपनी कानूनी और राजनीतिक आधार को मजबूत करने के लिए अब जबरन श्रम कानूनों (forced labor laws) को टैरिफ लगाने का मूल कारण बताया है। हालांकि, आलोचक इसे केवल संरक्षणवाद का दूसरा नाम बताते हैं और उनका मानना है कि यह बहाना बनाकर ट्रेड प्रतिबंध बनाए जा रहे हैं।

आधिकारिक बयान में कहा गया है कि चीनी और अन्य देशों से आयातित सामानों पर टैरिफ लगाने का मकसद उन उद्योगों का संरक्षण करना नहीं बल्कि मानवीय श्रम शर्तों का सम्मान करना है। अधिकारियों के मुताबिक, जिन कंपनियों ने जबरन श्रम का लाभ उठाया है, उनके उत्पादों पर प्रतिबंध लगाना न्यायसंगत कदम है।

इस नई रणनीति के तहत, अमेरिकी प्रशासन ने अपने दावे को वैधानिक रूप से मजबूती देने के लिए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय श्रम कानूनों और व्यापार समझौतों का हवाला दिया है। इस योजना को राजनीतिक रूप से भी टिकाऊ बनाने के लिए कई सांसदों एवं विशेषज्ञों से राय ली गई है।

हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों और व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इस नई बहाने के पीछे संरक्षणवाद का स्पष्ट एजेंडा है। वे बताते हैं कि ऐसे दावों के जरिये केवल घरेलू उद्योगों को बाहरी प्रतिस्पर्धा से बचाने की कोशिश की जा रही है। ट्रेड विशेषज्ञ माइकल थॉम्पसन का मत है कि “जब भी सरकारों को घरेलू उद्योग की रक्षा करनी होती है, वे ऐसे बहाने ढूंढ़ते हैं। यह नई बहस भी उसी की तरह है।”

इस निर्णय से वैश्विक व्यापार में नई चुनौतियां उत्पन्न हो सकती हैं। कई देशों ने इससे नाराजगी जताई है और अमेरिका के इस कदम को व्यापार विरोधी बताया है। इसके चलते, ट्रेड वार्स और भी तीव्र हो सकते हैं, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए हानिकारक हो सकता है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि अमेरिका इस नीति के तहत ऐसे उत्पादों पर निगरानी कड़ी करेगा जो जबरन श्रम से बने हैं। इस प्रकार के नियम लागू होने से श्रमिक अधिकारों की रक्षा होगी और बाजार में साफ-साफ नियम बने रहेंगे।

अचानक आए इस बदलाव ने व्यापार विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच बहस को भी जन्म दिया है कि क्या सच में यह श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए है या फिर केवल अमेरिकी उद्योगों की रक्षा के लिए। इस बहस का भविष्य में अमेरिकी नीति और वैश्विक व्यापार संबंधों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है।

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