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मार्कण्डेय पुराण – ऋषि मार्कण्डेय के शाश्वत ज्ञान की विरासत

नई दिल्ली, 27 अप्रैल 2024: मार्कण्डेय पुराण, जो अठारह महापुराणों में से एक अत्यंत सम्मानित ग्रंथ है, भारतीय सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में खड़ा है। माना जाता है कि यह पुराण तीसरी शताब्दी ईस्वी के आसपास रचा गया था और इसकी विशेषता यह है कि इसने अपनी मूल सामग्री का अधिकांश भाग बनाए रखा है, जिससे यह आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ज्ञान का अमूल्य स्रोत बन गया है।

मार्कण्डेय पुराण का नाम ऋषि मार्कण्डेय से जुड़ा हुआ है, जो हिन्दू धर्म के प्रख्यात मुनि थे। उनके जीवन और शिक्षाओं को समर्पित यह ग्रंथ विभिन्न कहानियों, उपदेशों और धार्मिक अनुष्ठानों का संग्रह है। इनमें से कई कथाएं सामाजिक और नैतिक मूल्यों को दर्शाती हैं, जो आज भी प्रासंगिक मानी जाती हैं।

विशेषज्ञ बताते हैं कि मार्कण्डेय पुराण में भगवती देवी के महत्व पर विशेष जोर दिया गया है। यह ग्रंथ देवी समर्पित कई अध्यायों के माध्यम से स्त्री शक्ति की महत्ता और उसकी पूजा का विस्तार करता है। इसके अतिरिक्त, इसमें लोककथाएं, वेदों के कुछ अंश और योग, धर्म, तथा आचार संहिताओं से संबंधित जानकारी भी सम्मिलित है।

इतिहासकारों एवं धार्मिक विद्वानों के अनुसार, मार्कण्डेय पुराण की भाषा और शैली उस काल के सांस्कृतिक परिवेश की गवाही देती है। यह ग्रंथ न केवल धार्मिक आस्था की ओर निर्देशित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय, नैतिकता एवं मानवता के सिद्धांतों को भी उजागर करता है।

आधुनिक काल में भी मार्कण्डेय पुराण का अध्ययन और इसका प्रचार-प्रसार विभिन्न गुरूकुलों, विश्वविद्यालयों तथा धार्मिक संस्थानों द्वारा किया जा रहा है। इससे न केवल प्राचीन धर्मग्रंथों की समझ बढ़ी है, बल्कि भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव भी मजबूत हुआ है।

संक्षेप में, मार्कण्डेय पुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और दर्शन की एक जीवंत धरोहर है, जो हमें अतीत की शिक्षाओं से वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शन प्रदान करता है।

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